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मैं ऐसा क्यों हूँ? Self-Discovery & Identity | गीता की दृष्टि से स्वयं को समझने की यात्रा

₹399
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मैं ऐसा क्यों हूँ? Self-Discovery & Identity | गीता की दृष्टि से स्वयं को समझने की यात्रा

Product details

मैं ऐसा क्यों हूँ?

Self-Discovery & Identity | गीता की दृष्टि से स्वयं को समझने की यात्रा

क्या आपने कभी खुद से पूछा है—मैं ऐसा क्यों हूँ?

  • मैं खुद को दूसरों से कम क्यों समझता हूँ?
  • दूसरों की बातें मुझे इतना प्रभावित क्यों करती हैं?
  • मैं बार-बार अपनी तुलना दूसरों से क्यों करता हूँ?
  • मैं दूसरों जैसा बनने की कोशिश क्यों करता हूँ?
  • सब कुछ होते हुए भी भीतर खालीपन क्यों महसूस होता है?
  • मैं खुद से खुश क्यों नहीं हूँ?
  • मैं अपनी वास्तविक पहचान क्यों नहीं समझ पा रहा हूँ?

इन सवालों के जवाब खोजते हुए हम अक्सर बाहर देखते हैं—लोगों की राय, सफलता, पैसा, रिश्ते, सोशल मीडिया और अपनी उपलब्धियों में।

लेकिन क्या इन सवालों के जवाब हमारे भीतर भी छिपे हो सकते हैं?

“मैं ऐसा क्यों हूँ?” स्वयं को समझने की एक सरल और आत्मचिंतनपूर्ण यात्रा है। इस पुस्तक में श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाओं के माध्यम से आधुनिक जीवन की उलझनों और स्वयं से जुड़े प्रश्नों को समझने का प्रयास किया गया है।

इस पुस्तक में आप किन विषयों को समझेंगे?

  • Self-Identity: मैं वास्तव में कौन हूँ?
  • Self-Worth: मैं खुद को कम क्यों आँकता हूँ?
  • Comparison: दूसरों से अपनी तुलना करने की आदत क्यों होती है?
  • Validation: मुझे दूसरों की स्वीकृति की आवश्यकता क्यों महसूस होती है?
  • Expectations: दूसरों की अपेक्षाएँ मेरे जीवन को कैसे प्रभावित करती हैं?
  • Nature & Personality: अपने स्वभाव के विरुद्ध जीने से भीतर संघर्ष क्यों पैदा होता है?
  • Self-Confidence: आत्मविश्वास और अहंकार में क्या अंतर है?
  • Inner Fulfilment: बाहरी उपलब्धियों के बावजूद मन में खालीपन क्यों रहता है?

यह पुस्तक आपको क्या दे सकती है?

यह पुस्तक आपको रातों-रात बदलने या तुरंत खुश रहने का दावा नहीं करती।

इसके बजाय, यह आपको आमंत्रित करती है—

  • थोड़ा रुकने और अपने भीतर देखने के लिए।
  • अपने विचारों और भावनाओं को समझने के लिए।
  • अपनी तुलना दूसरों से करने के बजाय स्वयं को जानने के लिए।
  • अपनी वास्तविक पहचान पर विचार करने के लिए।
  • श्रीमद्भगवद्गीता की दृष्टि से जीवन को एक नए नजरिए से देखने के लिए।

इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न

“मैं वास्तव में कौन हूँ?”

शायद खुद को बेहतर बनाने से पहले जरूरी है कि हम खुद को समझें। और शायद खुद को स्वीकार करने से पहले जरूरी है कि हम अपनी वास्तविक पहचान को जानें।

अगर आपके मन में कभी यह सवाल आया है—“मैं ऐसा क्यों हूँ?” तो यह पुस्तक आपकी आत्म-खोज की एक नई शुरुआत हो सकती है।

एक पुस्तक। स्वयं को समझने की एक नई दृष्टि।

Author: Nimai Bandhu Das
Publisher: Jigisha Foundation

Bhakti. Wisdom. Transformation.

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मैं ऐसा क्यों हूँ?

Self-Discovery & Identity | गीता की दृष्टि से स्वयं को समझने की यात्रा

क्या आपने कभी खुद से पूछा है—मैं ऐसा क्यों हूँ?

  • मैं खुद को दूसरों से कम क्यों समझता हूँ?
  • दूसरों की बातें मुझे इतना प्रभावित क्यों करती हैं?
  • मैं बार-बार अपनी तुलना दूसरों से क्यों करता हूँ?
  • मैं दूसरों जैसा बनने की कोशिश क्यों करता हूँ?
  • सब कुछ होते हुए भी भीतर खालीपन क्यों महसूस होता है?
  • मैं खुद से खुश क्यों नहीं हूँ?
  • मैं अपनी वास्तविक पहचान क्यों नहीं समझ पा रहा हूँ?

इन सवालों के जवाब खोजते हुए हम अक्सर बाहर देखते हैं—लोगों की राय, सफलता, पैसा, रिश्ते, सोशल मीडिया और अपनी उपलब्धियों में।

लेकिन क्या इन सवालों के जवाब हमारे भीतर भी छिपे हो सकते हैं?

“मैं ऐसा क्यों हूँ?” स्वयं को समझने की एक सरल और आत्मचिंतनपूर्ण यात्रा है। इस पुस्तक में श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाओं के माध्यम से आधुनिक जीवन की उलझनों और स्वयं से जुड़े प्रश्नों को समझने का प्रयास किया गया है।

इस पुस्तक में आप किन विषयों को समझेंगे?

  • Self-Identity: मैं वास्तव में कौन हूँ?
  • Self-Worth: मैं खुद को कम क्यों आँकता हूँ?
  • Comparison: दूसरों से अपनी तुलना करने की आदत क्यों होती है?
  • Validation: मुझे दूसरों की स्वीकृति की आवश्यकता क्यों महसूस होती है?
  • Expectations: दूसरों की अपेक्षाएँ मेरे जीवन को कैसे प्रभावित करती हैं?
  • Nature & Personality: अपने स्वभाव के विरुद्ध जीने से भीतर संघर्ष क्यों पैदा होता है?
  • Self-Confidence: आत्मविश्वास और अहंकार में क्या अंतर है?
  • Inner Fulfilment: बाहरी उपलब्धियों के बावजूद मन में खालीपन क्यों रहता है?

यह पुस्तक आपको क्या दे सकती है?

यह पुस्तक आपको रातों-रात बदलने या तुरंत खुश रहने का दावा नहीं करती।

इसके बजाय, यह आपको आमंत्रित करती है—

  • थोड़ा रुकने और अपने भीतर देखने के लिए।
  • अपने विचारों और भावनाओं को समझने के लिए।
  • अपनी तुलना दूसरों से करने के बजाय स्वयं को जानने के लिए।
  • अपनी वास्तविक पहचान पर विचार करने के लिए।
  • श्रीमद्भगवद्गीता की दृष्टि से जीवन को एक नए नजरिए से देखने के लिए।

इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न

“मैं वास्तव में कौन हूँ?”

शायद खुद को बेहतर बनाने से पहले जरूरी है कि हम खुद को समझें। और शायद खुद को स्वीकार करने से पहले जरूरी है कि हम अपनी वास्तविक पहचान को जानें।

अगर आपके मन में कभी यह सवाल आया है—“मैं ऐसा क्यों हूँ?” तो यह पुस्तक आपकी आत्म-खोज की एक नई शुरुआत हो सकती है।

एक पुस्तक। स्वयं को समझने की एक नई दृष्टि।

Author: Nimai Bandhu Das
Publisher: Jigisha Foundation

Bhakti. Wisdom. Transformation.

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